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पेट में कीड़े की वजह से नहीं होता 68 फीसदी बच्चों का विकास
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पेट में कीड़े की वजह से नहीं होता 68 फीसदी बच्चों का विकास

 

अगर आप का बच्चा ठीक से खाता-पीता नहीं है या खाता तो ठीक से है मगर बच्चे की उस अनुपात में लंबाई और वजन नहीं बढ़ रहा। ये शिकायतें आमतौर पर बच्चों की आतों में कीड़ा या कृमि (वर्म) होने से होती हैं। इस समस्या का इलाज बेहद आसान है, लेकिन आमतौर पर माता-पिता इस समस्या को गंभीरता से ही नहीं लेते।

संजय गाधी पीजीआई के पीडियाट्रिक गैस्ट्रो इंट्रोलाजिस्ट प्रो. मोनिक सेन शर्मा कहते हैं कि घनी आबादी और आमतौर पर नम वातावरण इन कृमियों के प्रसार के लिए आदर्श हैं। उत्तर प्रदेश सहित ऐसे राज्यों में ज्यादा है, जिसमें एक से 14 साल की उम्र के लगभग 68 फीसद बच्चे आतों में कृमि के संक्रमण से ग्रस्त हैं। पेट में परजीवी की तरह पड़े रहने वाले ये कीड़े आपके बच्चे का अधिकाश पोषण खुद हड़प जाते हैं। उन्होंने बताया कि बच्चों को साल में दो बार एल्बेंडाजोल दवा देनी चाहिए। ध्यान सिर्फ इतना रखना है कि कृमि के लक्षण नजर आते ही पहले डॉक्टर की सलाह लें।

पढ़ाई में हो जाते हैं कमजोर 

पेट में कृमि होने पर बच्चे पढ़ाई में एकाग्रचित्त नहीं हो पाते हैं। कृमि और अंडों की संख्या बहुत अधिक हो जाए तो आत में एक तरह का जाल बना देते हैं, तब बच्चों को अत्यधिक रक्तस्त्राव की आशका रहती है। इसके अलावा दुर्लभ मामलों में मस्तिष्क में भी कीड़े के अंडे पहुंचने की घटनाएं सामने आई हैं, जिससे बच्चों को दौरे भी पड़ने लगते हैं।

12 महीने बाद से रहता है खतरा 

बच्चे के एक वर्ष का होने के बाद उसके इस तरह के कृमि संक्रमण में आने का खतरा बढ़ने लगता है, क्योंकि जन्म के बाद से लेकर करीब 10 महीने तक बच्चा किसी न किसी की गोद में रहता है। इसलिए जमीन से होने वाले कृमि संक्रमण से वह बचा रहता है। मगर इसके बाद वह घुटनों के बल चलने और लुढकने लगता है, तब संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है।

पांच से 15 साल की उम्र में अधिक खतरा

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अध्ययन बताते हैं कि पांच वर्ष की उम्र से लेकर 15 वर्ष तक की उम्र के बच्चे सबसे अधिक इसकी चपेट में आते हैं। क्योंकि बच्चे पार्क में अक्सर नंगे पैर खेलते हैं और बाद में बिना हाथ-मुंह धोए कुछ भी खा लेते हैं। चूंकि ये कृमि पैर की त्वचा, मल मार्ग और मुंह, कहीं से भी शरीर में प्रवेश कर सकते हैं, इसलिए इस उम्र के बच्चे इनका आसान शिकार होते हैं।

बच्चों को यह होती है परेशानी

खून की कमी, भूख न लगना या अत्यधिक भूख, वजन न बढ़ना, बच्चों का पेट असामान्य रूप से बढ़ना, खून की कमी के कारण थकान, मल मार्ग में खुजली भी इसका लक्षण है। बच्चे का मिट्टी खाना और दूसरा नींद में दात किटकिटाना (अवैज्ञानिक लक्षण)।

 

 

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